कभी इस पग में, कभी उस पग में,
बंधती ही रही हूँ मैं
कभी टूट गया कभी तोडा गया,
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया,
यूँ ही लुट लुट के, और मिट मिट के
बंधती ही रही हूँ मैं;
घुंघुरू की तरह , बजती ही रही हूँ मैं
मैं करती रही औरों की कही,
मेरी बात मेरे मन ही में रही,
कभी मन्दिर में, कभी महफिल में,
सजती ही रही हूँ मैं;
घुंघुरू की तरह , बजती ही रही हूँ मैं
आपनो में रहे या गैरों में;
घुंघुरू की जगह तो है पैरों में;
फिर कैसा गिला, जग से जो मिला;
सहती ही रही हूँ मैं;
घुंघुरू की तरह , बजती ही रही हूँ मैं
घुंघुरू की तरह , बजती ही रही हूँ मैं;
कभी इस पग में, कभी उस पग में,
बंधती ही रही हूँ मैं
किशोर दा
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