Saturday, September 26, 2009

बहुत दिनों के बाद

आज बहुत दिनों के बाद यह मौका हाथ आया है की दिल की भावनाओ को बयान कर दे। आज तक के इस सफर में, जीवन में कई उतार चढाव आयें हैं मगर सबमें एक बात एक जैसी थी मैंने सब पर विजय प्राप्त कर ली। जीती मैं आपने बल बूते पर। न कोई सहारा, न कोई साथी, हर भावना को स्वयं महसूस किया, झुझा और परास्त किया। आज बहुत दिनों बाद यह लगता है की शायद उस साथ की जिसकी तलाश हमेशा रहती थी अब उसकी ज़रूरत नही है। शायद.... शायद मैं अब उस मकाम पर पहुँच चुकी हूँ जिसमें मुझे आपने आप को संभालने के लिए किस्सी की ज़रूरत नही है... ज़िन्दगी जीने के लिए किस्सी की ज़रूरत नही है

बावजूद इसके की इस बीच में आपसे मिलने नही आई लेकिन लिखना नही छोड़ा था मैंने। आज वक्त मिला है। उनमें से कुछ यहाँ पेश करने का तोह सोचा आज यह ही काम कर लिया जाए।

1/august/2009 को शशा की philosophy की कक्षा में bore होते होते लिखी यह कविता:

ज़िन्दगी की मुडी हुई तस्वीर को सीने से लगाये बैठी हूँ,
सब कुछ खोने के बाद भी कुछ पाने की उम्मीद लगाये बैठी हूँ

क्या है यह जीना ज़िन्दगी के बिना,
आज आपने आप से हर खुशी को छीना
एक एक कर जो आंसू गिरे हैं,
आज तन्हाई में बैठ हमने उनको गिना।

न सोचा था कभी की एक दिन,
जीवन में ऐसा भी एक मोड़ आएगा ,
हर खुशी, हर आरजू, हर ख्वाब को,
यह मेरा दिल पीछे छोड़ आएगा।

तुम ऐसे हो तुम वैसे हो,
यह तोह सब कहते हैं,
पर अंतरात्मा में हम कैसे हैं,
बस येही सोचते रहते हैं।

चल पड़े हैं इस खोज की राह में तनहा,
साथी मिलते हैं रहो में, बिछड़ जाते हैं,
समेटे रखते हैं सीने में हम हर एक लम्हा,
लाख कोशिशों के बाद भी हम कुछ न कर पाते हैं।

भीड़ में चले जा रहे हैं,
न ख़ुद की ख़बर,न गैरों की,
रूबरू होने की कोशिश हो रही थी,
पर कश्ती डगमगा रही है संग लहरों की।

राह भटके है, भूले हैं, बिसरे हैं,
अस्तित्व पर भी कई सवाल उठे हैं,
हर उम्मीद हर आशा कहीं खो गई है,
दिल में शायद गम घर कर बैठे हैं।

ज़िन्दगी से मौत को जीतने की
भरपूर कोशिश हो रही है,
आज आपना अस्तित्व मिटने का,
सामान जुटाने की कोशिश हो रही है!!!!

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